मशहूर लॉर्ड एक्टन – “इतिहास का मजिस्ट्रेट” – ने कहा है, ” शक्ति भ्रष्ट करती है और पूर्ण शक्ति पूरी तरह से भ्रष्ट करती है। महान पुरुष लगभग हमेशा बुरे होते हैं, तब भी जब वे अपने प्रभाव का प्रयोग कर रहे होते हैं अधिकार का नहीं ” यह उद्धरण भ्रष्टाचार की अपरिहार्यता इंगित करता है। यह अपरिहार्य भ्रष्टाचार अलग अलग संस्थानों में अलग अलग रूपों और स्तरों में दिखाई देता है| और संस्थानों के विभिन्न व्यक्तियों में इसकी भाषा और परिभाषा अलग होती है।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी भ्रष्टाचार सूचकांक 2016 में 176 देशों के बीच भारत का 79 वां रैंक भ्रष्टाचार की समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। सरकार हो या सरकारी संगठन, भ्रष्टाचार हर जगह है| सभी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार इतना स्पष्ट है कि या तो हम अपनी आँखें मूँद लेते हैं या हम हम खुद भ्रष्टाचार का हिस्सा बन जाते हैं।
भ्रष्टाचार का अगर मूल तलाशा जाए तो सरकार में मौजूद भ्रष्टाचार राजनीतिक अभिजात वर्ग के उभरने से उत्पन्न होता है जो राष्ट्र-उन्मुख कार्यक्रमों और नीतियों के बजाय स्वार्थपरक कार्यक्रमों और नीतियों में विश्वास रखते हैं। इसके अलावा, व्यापक निरक्षरता और गरीबी भी भ्रष्टाचार का कारण बनता है। साथ ही जटिल कानून और प्रक्रियाएं आम लोगों को प्रणाली से अलग करती हैं और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती हैं। हमारा नैतिक दिवालियापन भ्रष्टाचार का मूल कारण हैं और यही दिवालियापन संस्थानों में भ्रष्टाचार पैदा करता है| नैतिक मूल्य, जो व्यक्तिपरक है तो सामाजिक भी , ऐसे मापदंड हैं जो गलत से सही का भेद कराते हैं| और इन्हीं नैतिक मूल्य के दृष्टिकोण से भ्रष्टाचार को परिभाषित किया जा सकता है।
एक मानव का भ्रष्ट होना इस पर निर्भर करता है कि वह अपने समाज के नैतिक संहिता के प्रति कितना सत्यनिष्ठ है| सत्यनिष्ठा की कमी भ्रष्टाचार है और मानव की सत्यनिष्ठा भ्रष्टाचार के खिलाफ उसकी लड़ाई. एक लेखक ने लिखा “प्रकृति के कानूनों में कोई न्याय नहीं है, गति के समीकरणों में निष्पक्षता के लिए कोई भी शब्द नहीं है। ब्रह्मांड न बुरा है, न ही अच्छा है, यह बस परवाह नहीं करता है। तारों को परवाह नहीं है, या सूर्य, या पृथ्वी को परवाह नहीं है! हमें परवाह है! दुनिया में अगर प्रकाश है तो वह हम हैं!” और मैं जोड़ता हूं कि दुनिया में अगर भ्रष्टाचार रूपी अंधेरा है तो वह हमारी वजह से है.
भ्रष्टाचार से निवारण व्यक्तिगत स्तर पर नैतिकता, सेवा और ईमानदारी के पुराने आदर्शों को पुनर्जीवित करने में है और संस्थानो में उन प्रणालियों को अपनाने में है जो पारदर्शी हैं। “मुझे विश्वास नहीं है कि भ्रष्टाचार एक एकल नेता, एक राजनीतिक दल या मीडिया द्वारा समाप्त किया जा सकता है। केवल युवाओं के आंदोलन, जो अपने घरों से शुरू होता है, से भ्रष्टाचार समाप्त हो सकता है” -कलाम ने कहा
भ्रष्टाचा र का शाब्दिक अर्थ है भ्रष्ट-आचरण, किन्तु आज यह शब्द ‘रिश्वतखोरी’ के अर्थ में प्रयुक्त होता है। भ्रष्टाचार की यह समस्या इतनी व्यापक हो गई है कि हम यहाँ तक कहने लगे हैं कि आज के युग में ‘भ्रष्टाचार’ से वही बच पाता है जिसे भ्रष्ट होने का अवसर नहीं मिल पाता । सत्य तो यह है कि भ्रष्टाचार हमारी पहचान है, हमारा राष्ट्रीय चरित्र है। आज के इस युग में राजनीतिज्ञ, अधिकारी, न्यायाधीश, वकील, शिक्षक, डॉक्टर, राजकर्मचारी, इन्जीनियर सबके सब भ्रष्ट हैं।
भ्रष्टाचार हमारा राष्ट्रीय चरित्र
भारत में भ्रष्टाचार की जड़े इतनी गहरी हैं तथा यह इतना सर्वव्यापी है कि हम भ्रष्टाचार को ही अपना चरित्र कह सकते हैं। यद्यपि भारत एक आध्यात्मिक देश है और इतिहास साक्षी है कि हम लोग सन्तोषी जीव रहे हैं तथापि धनलिप्सा ने हमें अपनी नैतिकता, मानवता वादी मूल्यों से जैसा वर्तमान समय में विचलित कर दिया है, वैसा पहले कभी नहीं था । धर्म, अध्यात्म, नैतिकता भले ही हमें सदाचार की शिक्षा देते हों, किन्तु हमारा आचरण दिनों दिन भ्रष्ट होता जा रहा है। यहाँ एक बात स्पष्ट कर देनी आवश्यक है और वह यह है कि भ्रष्टाचार का तात्पर्य केवल ‘रिश्वत’ ही नहीं, अपितु अनुचित मुनाफा खोरी, करों की चोरी, मिलावट, कर्तव्य के प्रति उदासीनता, सरकारी साधनों का अनुचित प्रयोग भी भ्रष्टाचार की परिधि में आते हैं। “आइए हम अपने-अपने गिरेबा न में झाँककर देखें और फिर इस कथन की परीक्षा को क्या भ्रष्टाचार हमारा राष्ट्रीय चरित्र नहीं है?”
भ्रष्टाचार की व्यापकता
स्वतन्त्रता प्राप्ति के अवसर पर देश की जनता ने यह परिकल्पना की थी कि अब हमारी अपनी सरकार होगी और हमें भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी, किन्तु यह परि कल्पना सच नहीं हुई और अब तो हालात इतने बदतर हो गए हैं कि इस भ्रष्टाचार रूपी दानव ने समाज को पूरी तरह अपने मजबूत जबड़ों में फंसा लिया है। आज भ्रष्टाचार का जो स्वरूप हमारे देश में विद्यमान है उससे सभी परिचित हैं। सरकारी कार्यालयों में बिना भेंट पूजा दिए हुए कोई काम करवा लेना असम्भव है। क्लर्क के रूप में जो व्यक्ति सीट पर बैठा हुआ है वही आपका असली भाग्य विधाता है। अफसर को यह ऐसे-ऐसे चरके देता है कि बेचारे को नानी याद आ जाती है। यदि क्लर्क न चाहे, तो आप एड़ियाँ रगड़ते रहिए आपकी फाइल पर ‘फारवर्डिंग’ नोट नहीं लगेगा और भला किस अफसर की मजाल है जो क्लर्क की टिप्पणी के बगैर अपना निर्णय लिख दे। कहावत है कि प्रान्त में बस दो ही शक्ति शाली व्यक्ति हैं लेखपाल या राज्यपाल। लेखपाल ने जो लिख दिया, उसे काटने वाला तो जिलाधीश भी नहीं ।
आयकर की चो री भ्रष्टाचार के चलते हुए आज लाखों रुपए महीने कमाने वाले डॉक्टर, वकील, वा स्तुविद विभिन्न उपायों से आयकर की चोरी करते हैं। ‘प्रो फेशनल’ कार्य करने वाले कितने लोग ऐसे हैं जो सही आयकर देते हैं ? व्यापारियों और उद्योगपतियों ने तो बाकायदा चार्टर्ड एकाउण्टेण्ट रखे हुए हैं जो उन्हें कर बचाने तथा कर चोरी करने के उपाय सुझाते हैं। यदि सभी लोग सही ढंग से आयकर अदा करने लगें तो हमारे देश की निर्धनता समाप्त हो जाए। शिक्षक कॉलेजों में पढ़ाने में उतनी रुचि नहीं लेते जितनी ट्यूशन की दुकानों को चलाने में लेते हैं। विद्यार्थियों को ट्यूशन पढ़ने के लिए बाध्य करने हेतु तरह-तरह के हथकण्डे अपनाए जाते हैं। स्कूल-कॉलेज में कक्षाएं नहीं लगतीं, किन्तु कोचिंग स्कूलों में सदैव भीड रहती है। ट्यूशन की मोटी कमाई कर वे कोई आयकर नहीं देते। सरकारी अधिकारी, जिन्हें जनता का सेवक माना जाता है, दोनों हाथों से जनता को लूट रहे हैं। पुलिस का मामूली दरोगा चार-पांच वर्ष की नौकरी में ही मोटर साइकिल, मकान, टी. वी., फ्रिज जैसी सुविधाएं जुटा लेता है। क्या सरकार उससे कभी पूछती है कि भाई अपने वेतन में इतनी बचत कैसे कर लेते हो जो लाखों रुपए की सम्पत्ति खरीद ली । ये सब भ्रष्ट आचरण से काला धन अर्जित कर रहे है।
राजनीति में भ्रष्टाचार
राजनीति में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है। सच तो यह कि भारतीय चुनाव पद्धति लोकतन्त्र की खिलवाड़ है। कौन नहीं जानता कि सरकार द्वारा प्रत्याशियों के लिए निर्धारित व्यय सीमा में चुनाव लड़पाना असम्भव है। नेता गण चुनाव जीतने के लिए सभी मर्यादाओं को त्याग देते हैं और जब वे भ्रष्ट आचरण से चुनाव जीतते हैं तो फिर नाक तक भ्रष्टाचार में डूबकर पैसा बनाते हैं। यदि ऐसा नहीं करेंगे, तो अगले चुनाव में अपनी नैया कैसे पार लगेगी। राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव खर्च के लिए बड़े-बड़े उद्योगपतियों से चन्दा लेती हैं और फिर उन्हें लाभ पहुँचाने के लिए ऐसे नीतिगत निर्णय लिए जाते हैं जिससे उद्योगपतियों की चाँदी कटती है और गरीब जनता पर उसका बोझ पड़ता है। देश के लिए किए गए बड़े-बड़े सौदों में कमीशन, दलाली के नाम पर लम्बी रकमें ऐंठ ली जाती हैं। बोफोर्स सौदे में कमीशन लिया गया, यह तो सिद्ध हो गया पर किसने यह रकम डकार ली यह रहस्य उजागर नहीं हो सका । ‘तहलका’ के जांबाज रिपोर्टरों ने छुपे कैमरे के माध्यम से जो सच टी.वी. पर उजागर किया उसने इन राजनीतिज्ञों को नंगा कर दिया । पर वे तो बेशर्म हैं, जानते हैं कि जनता कुछ दिनों में इसे भूल ही जायेगी ।
भ्रष्टाचार : एक सामाजिक अभिशाप
भ्रष्टाचार एक सामाजिक अभिशाप है। भ्रष्टाचार को सही ठहराने के लिए लोग तरह-तरह के तर्क गढ़ते हैं। यथा – ‘साहब, इसी बढ़ती हुई महँगाई में वेतन से खर्च नहीं चल सकता’, अतः मजबूर होकर हमें रिश्वत लेनी पड़ती है, या फिर, क्या करें पुत्री के विवाह में बीस लाख का दहेज देना है। अब इतना पैसा वेतन से तो बचाया नहीं जा सकता । ऐसे कितने ही तर्क बेमानी हैं। सच तो यह कि वे अपने अपराध बोध से ग्रस्त रहते हैं और उसे कम करने के लिए इस प्रकार के तर्क गढ़ लेते हैं, जिनमें कोई वजन नहीं है।
भ्रष्टाचार के कारण
भ्रष्टाचार का मूल कारण है अधिक-से-अधिक धन कमाने की प्रवृत्ति । आज हमारी दृष्टि बदल गई है। हम भौतिकवादी हो गए हैं और वस्तुओं के प्रति गहरा मोह बढ़ गया है। सुविधा भोगी जीवन-पद्धति के हम आदी बन गए हैं। जैसे भी सम्भव हो भोग-विला स के उपकरण एकत्र किए जाएँ। पारस्परिक प्रतिस्पर्धा ने विचार को बढ़ावा दिया है। अब यदि पड़ोसी के घर में रंगीन टी.वी. और स्मार्ट टी० वी० है तो भला मेरे यहाँ क्यों न हो ? बस एक अन्धी दौड़ प्रारम्भ हो जाती है जिसका समापन भ्रष्टाचार के कुएं में होता है। सबसे चिन्ताजनक बात तो यह है कि आज भ्रष्टाचार को लोगों ने सामाजिक मान्यता प्रदान कर दी है। भ्रष्टाचार के बलबूते पर धन अर्जित करके लोग सम्मान प्राप्त कर रहे हैं और समाज यह जानते हुए भी कि धन बेईमानी से अर्जित किया गया है उसका तिरस्कार नहीं करता । परिणामतः भ्रष्टाचार पनपने में सहायता मिलती है। आज ईमानदारी, नैतिकता, सत्य को धता बताई जा रही है। कहा जाता है कि आज ईमानदार वही जिसे बेईमानी का मौका नहीं मिल पाता । ईमानदार आदमी को लोग मूर्ख, पागल, गाँधी का अवतार कहकर खिल्ली उड़ाते हैं और बेईमान को इज्जत देते हैं। ऐसे समाज में कौन मूर्ख ईमानदार बनना चाहेगा ।
भ्रष्टाचार को समाप्त करने के उपाय
भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए सरकार ने कानून बनाए हैं, किन्तु वे अधिक प्रभावी नहीं हैं। कहा जाता है कि भ्रष्टाचार की जड़े ऊपर होती हैं। यदि किसी विभाग का मन्त्री या सचिव रिश्वत लेता है तो उसका चपरासी भी भ्रष्ट होगा । अतः भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए ऊपर के पदों पर योग्य एवं ईमानदार लोगों को आसीन किया जाए। कर्तव्यनिष्ठ एवं ईमानदार लोगों को सरकार एवं समाज की ओर से सम्मानित किया जाए तथा नैतिक व आध्यात्मिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया जाए। शिक्षकों एवं समाज के अन्य जिम्मेदार नागरिकों को विद्यार्थियों के समक्ष आदर्श उपस्थित करना चाहिए। समाज भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों का सामाजिक तिरस्कार एवं बहिष्कार करे और ऐसे लोगों को महिमा मण्डित न करे जो भ्रष्टाचार से धन अर्जित करते हैं।
दहेज प्रथा जैसी सामाजिक बुराई को दूर करने पर भी भ्रष्टाचार में कमी आएगी । आयकर के अधिक-से- अधिक छापे मारे जाएँ और प्रत्येक व्यक्ति से उसके आय-व्यय का हिसाब-किताब पूछा जाए। सरकारी कर्मचारियों पर विशेष निगाह रखी जाए जिससे वे अनुचित साधनों से धन अर्जित न कर सकें। सम्भव हो तो उनकी सम्पत्ति की खुफिया जाँच करवाई जाए, उनके रहन-सहन के स्तर को भी देखा -परखा जाए।
भ्रष्टाचार का मुख्य कारण है, स्वीकृति ||
जी हाँ!! इसके लिये हम किसी को नहीं अपितु खुद को जिम्मेदार ठहराएं | हम सभी ने कहीं ना कहीं इसे सिस्टम का हिस्सा मान कर अपना लिया है | हम भ्रष्टाचारियों को कोसते है पर वही अपना काम जल्दी कराने के लिये हम खुद उसे बढ़ावा भी देते हैं |
- ड्राइविंग लाइसेंस जल्दी नहीं बना रहा, थोड़ा खिला देंगे|
- पासपोर्ट के लिये पुलिस वेरिफिकेशन में समय लगेगा चलो थोड़ा साहब को खर्चा पानी दे देंगे |
- हेलमेट नहीं पहना है , गाड़ी के कागज़ नहीं है , ट्रैफिक पुलिस वाले को 100–50 दे कर बच जायेंगे |
- सरकारी टेंडर हमें ही मिले इसके लिये सरकारी बाबू को थोड़ा मिठाई भिजवा देते है | और फिर जो पैसा उनकी खातिरदारी में खर्च होगा वो हम काम की गुड़वत्ता कम करके खानापूर्ति कर लेंगे |
हमारा इस सब को ले कर ‘casual attitude’ (सब ठीक है ) ही इस सब का जिम्मेदार है, सिर्फ सरकारों को कोसने से कुछ नहीं होगा पहला बदलाव हमें खुद से शुरू करना होगा, अपनी सोच में परिवर्तन करके |
सबसे बड़ा कारण यह है कि, लोग मात्र अपने बारे में सोचते है अर्थात सब अपनी जेबे भरने में वयस्त है! जब तक लोगो के दिल और दिमाग में यह सोच पैदा नहीं होगी कि यह चोरी, रिश्वतखोरी (भ्रष्टाचार ) न करे इससे हमारा ही नुकसान है, इसका बोझ देश की गरीब जनता पर पड़ेगा !
अगर यह सोच पैदा होती है और भ्रष्ट लोग इस देश को अपना माने, अपना घर माने और जनता को अपने घर के सदस्य और यह सोचे कि यह चोरी करने से मेरे घर के सदस्यों को हानि पहुँचेगी,मैं अपने ही घर में अपने लोगों के बीच चोरी, धोखा आदि कर रहा हूँ! ऐसी सोच जब तक नहीं आती लोगो में तब तक कुछ नहीं बदलने वाला! भले चाहे कितने भी अधिकारी इस भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही कर ले, सरकार भले कितनी ही कोशिशे करले, कितने ही कार्यक्रम शुरू करले इस दिशा में, भले कितना भी डिजिटलाइजेशन करले, कितने ही कानून बना ले, कुछ नहीं होने वाला, यह समस्या ठीक उसी प्रकार की है, जैसे कचरे की अर्थात स्वच्छता की। सरकार भले कितने ही कार्यक्रम शुरू कर ले स्वच्छता के लिए, परन्तु जिन लोगो को अपने घर के बाहर कचरा डालना है, वे लोग डालेंगे ही, जिन लोगों को रास्ते में थूकना है वे लोग ऐसा करेगें ही, भले आप और मैं या सरकार कितने ही स्वच्छता अभियान चला ले, एेसे लोग करेंगे ही ।
जब ऐसे लोगो के अतःआत्मा से आवाज नहीं आती और ये लोग स्वयं ऐसा न करने की ठान लें, तब तक सब व्यर्थ है। जब तक इस भारत देश को अपना घर नहीं समझा जाता तब तक ऐसे विषयो में परिवर्तन होना नामुमकिन है।
भ्रष्टाचार का मुख्य कारण भारत की घटिया लोकतत्रात्मक व्यवस्था है।
जिसमें शीर्ष पर बैठा व्यक्ति सीधा जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है। जैसे – प्रधानमंत्री बनने के लिए शीर्ष नेता को सांसदो का ख्याल रखना पड़ेगा ना कि जनता का। इसी तरह मुख्यमंत्री या कोई अन्य पद।
इसके अलावा भारतीय न्याय व्यवस्था में भी कठोर दंड का प्रावधान होना चाहिए। जो नहीं है ओर यह भी एक भ्रष्टाचार का मुख्य कारण है।
मेरी नज़र में भृष्टाचार का मूल कारण है लोग बस जैसे तैसे करके अपना काम निकालना चाहते हैं।
जी हाँ अपना काम हो जाना चाहिए बस कैसे भी हो।
पर इसकी तह तक जाएं तो पता चले कि लोग अगर ऐसा सोच रहे हैं तो वजह क्या है तब वजह जो सामने आती है वो है किसी भी सक्षम कर्मचारी/अधिकारी द्वारा बिना पैसों के काम नही करना। जिसने वजन रखा उसका काम होता है।
उदाहरण स्वरूप- यदि आपको राशन कार्ड में से नाम हटवाना हो तो 15 दिन का समय लगता है पर यदि आप 100 रुपये का अतिरिक्त खर्चा करते हो तो दूसरे दिन आपका काम हो जाएगा।
यह मेरा खुद का अनुभव है।
भ्रष्टाचार के कारण
# 1.नैतिकता का हास
भ्रष्टाचार का सबसे महत्वपूर्ण कारण नैतिकता का हास होना हैं.प्राचीन काल में हमारा देश भारतीय मूल्यों जैसें ईमानदारी, सच्चरित्रता,सत्यनिष्ठा के कारण सम्पूर्ण विश्व में अलग पहचान रखता था. ये मूल्य प्रत्येक भारतीय की विशेषता थें.
किंतु शनै:शनै: इन मूल्यों को हास शुरू होना शुरू हो गया और इनका स्थान पर बेईमानी,भ्रष्ट आचरण,झूठ,छल कपट आदि ने ले लिया.
आज ये मूल्य भारतीय समाज में इस कदर व्याप्त हो गये हैं,कि समाज में यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार का आचरण करता हैं,तो समाजजनों द्धारा इसे बहुत हल्कें में लिया जाता हैं.बल्कि कहा तो यह भी जाता हैं,कि व्यक्ति को आज के समाज के हिसाब से चलना चाहियें.जिसमें “भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार हैं”
#2.भौतिकवादी सोच
आज के समय में व्यक्ति में सच्चरित्रता की अपेक्षा धन दौलत की तलाश की जाती हैं.उदाहरण के लियें यदि कोई व्यक्ति अपनी लड़की के लिये रिश्ता देखता हैं,तो बजाय गुणों के यह देखता हैं कि रिश्तेदार के पास कितनी संपत्ति हैं,फिर यह संपत्ति किस तरीके से अर्जित की गई हैं.इसका कोई महत्व नही हैं.
यही भौतिकतावादी सोच भ्रष्टाचार को जन – जन के बीच व्याप्त कर रही हैं.
भौतिकतावादी संस्कृति लोगों में इस कदर पेंठ कर गई हैं,कि यदि कोई व्यक्ति किसी जिम्मेदार पद पर हैं,और ईमानदारी पूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा हैं,तो उसे मूर्ख समझा जाता हैं.उसके बारें में कहा जानें लगता हैं,कि उसनें अपनें पत्नि बच्चों की सुख सुविधा के लिये कुछ नही किया.
बड़ा मकान,गाड़ी,सुख सुविधा और तथाकथित ऐशोआराम के लिये बहुत सारा पैसा चाहियें जिसे मध्यम आय वर्ग वाला व्यक्ति भ्रष्ट आचरण से अर्जित करना चाह रहा हैं.
# 3.कठोर कानूनों का अभाव
भारत में भ्रष्टाचार का इतिहास देखें तो पता चलता हैं,कि लगभग 95% मामलों में न्यायालय भ्रष्टाचारी को कठोरतम सजा देनें में असफल साबित हुआ हैं.फलस्वरूप आनें वाली भ्रष्टाचारी पीढी़ में यही संदेश गया कि इतनें बड़े भ्रष्टाचार करनें के बाद यदि पकड़े गये और सजा हुई तो वह स्वीकार्य होगी.
सजा होनें के पूर्व भी भारतीय न्याय प्रणाली में इतनें छिद्र हैं,कि भ्रष्टाचारी व्यक्ति इनसें आसानी से बच निकलता हैं.और मामूली सजा के बाद मजें से भ्रष्टाचार से अर्जित पैसों से फरियादी को मुँह चिढ़ाता रहता हैं.
स्वतंत्रता के पश्चात भारत कितनें ही बड़ें घोटालों जैसें जीप कांड़,दूरसंचार घोटाला,चीनी घोटाला,बोफोर्स घोटाला ,ताबूत घोटाला,चारा घोटाला,कामनवेल्थ खेल घोटाला ,बैंकिंग धोखाधड़ी आदि का साक्षी रहा हैं,किंतु इन घोटालों से भारत की न्याय प्रणाली और विधायिका ने कोई सबक नहीं लिया इसी का परिणाम हैं,कि भारत नित नये घोटालों की बाढ़ में नहा रहा हैं.
आजकल सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार को ” कम जोखिम अधिकतम फायदा” कहकर भारतीय न्याय प्रणाली का मजाक उड़ाया जाता हैं.
# 4.शासन प्रशासन में व्याप्त कमियाँ
दुनिया के वे बड़े संगठन जिनमें भ्रष्टाचार लगभग न के बराबर हैं,जैसें Google, Facebook, Microsoft, Apple,अमेरिकी प्रशासन, ब्रिटिश प्रशासन, नार्वें प्रशासन आदि का अध्ययन करतें हैं.तो पता चलता हैं,कि यदि इन संगठनों से किसी व्यक्ति को कोई काम करवाना हैं,और यदि इसके लियें कोई आनलाइन आवेदन करता हैं,तो आवेदन के साथ प्राप्ति रसीद पर कार्य होनें की समय सीमा लिख दी जाती हैं,साथ ही यह भी लिख दिया जाता हैं,कि समय सीमा में कार्य नहीं होनें पर आप कहाँ अपील कर सकतें हैं.
लेकिन यदि हम भारतीय प्रशासन का अध्ययन करतें हैं,तो पता चलता हैं,कि कई विभागों में कुछ गिनी चुनी सेंवाओं को छोड़कर किसी भी काम की समय सीमा तय नहीं हैं.
जहाँ कार्यों को करनें की समय सीमा तय हैं,वहाँ भी लालफीताशाही इतनी अधिक हैं,कि समय सीमा का पालन नहीं होता हैं.
कार्यों की समय सीमा तय नहीं होनें से अधिकारी कर्मचारी संबधित फाईलों को लम्बें समय तक अपनें पास दबाकर बैंठे रहतें हैं,फलस्वरूप व्यक्ति अपनी फाईल आगें बढ़ानें हेतू बड़ी रकम घूस के रूप में देता हैं.
# 5.वेतन विसंगति
सम्पूर्ण भारत में चाहें वह राज्य सरकार द्धारा नियत्रिंत विभाग हो या केन्द्र सरकार द्धारा नियत्रिंत विभाग इन विभागों में कार्य करनें वालें अधिकारीयों और कर्मचारीयों में वेतन विसंगति की खाई इतनी चोड़ी हैं,कि यह छोटें कर्मचारी के मन में इतनी हीनता भर देती हैं,कि वह न चाहतें हुये भी भ्रष्टाचार से अपनें परिवार को पालनें हेतू भ्रष्ट तरीकों का सहारा लेता हैं.
भारत में मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी का वेतन लगभग 2.50 प्रतिमाह हैं साथ ही अन्य जरूरी सुविधायें जैसें गाड़ी,बंगला,नौकर और भत्तें भी मिलतें हैं.जबकि उसी मंत्रालय में काम करनें वालें चपरासी को मात्र 18 से 30 हजार तक ही वेतन मिलता हैं,जो कि आज के महंगाई वालें जमानें में सामान्य परिवार की ज़रूरतों के लिये नाकाफी हैं.
एक अन्य बात यह हैं कि इतना कम वेतन मिलनें के बाद भी यदि कोई व्यक्ति आफिस समय के बाद नियोजित होता हैं,तो इस पर शासन का प्रतिबंध रहता हैं.फलस्वरूप व्यक्ति के पास सिर्फ भ्रष्टाचार द्धारा पैसा बनानें का ही विकल्प बचता हैं.
कई विभागों में तो कर्मचारीयों की वेतन विसंगति मात्र इसी आधार पर दूर नहीं की जाती हैं,कि वहाँ घोषित रूप से यह मान लिया गया हैं,कि यहाँ के कर्मचारी अधिकारी की “ऊपरी कमाई” वैसे भी बहुत अधिक हैं.
# 6.राजनितिक पार्टीयों का स्वार्थी गठबंधन
भारत में जबसें गठबंधन दलों की सरकार बननी शुरू हुई हैं,तब से भ्रष्टाचार दिन दुगनी रात चौगुनी तरीके से उन्नति करतें हुये नित नये रिकार्ड़ स्थापित कर रहा हैं.
हमारें देश की प्रमुख पार्टीयों के कई शीर्ष लोगों पर भ्रष्टाचार के केस अदालतों में चल रहें हैं,परंतु सत्तारूढ़ दल जानबूझकर इन शीर्ष नेताओं के विरूद्ध कम़जोर अभियोजन प्रस्तुत करता हैं, क्योंकि उसे पता हैं न जानें कब सरकार बनानें में इस दल के सहयोग की ज़रूरत पड़ जायें.
स्वार्थी गठबंधन का एक अन्य उदाहरण राजनितिक दलों को मिलनें वालें चंदे का हैं,जब अन्य दूसरें मुद्दों पर बात करनें की बारी आती हैं,तो राजनितिक दल पानी पी पीकर एक दूसरें पर आरोप प्रत्यारोप लगातें हैं किंतु इनकों मिलनें वालें राजनितिक चंदों पर यह दल न तो एक दूसरें पर आरोप लगातें हैं और ना ही इस मुद्दें पर बात करतें हैं.फलस्वरूप राजनितिक दल अपनें अपनें तरीके से खूब पैसा एकत्रित करतें हैं.
# 7.सामाजिक कुरूतियाँ
देश को सामाजिक कुरूतियों ने इस कदर जकड़ रखा हैं,कि इन कुरूतियों ने भ्रष्टाचार को प्रश्रय ही दिया हैं,उदाहरण के लिये आज भी व्यक्ति को अपनी लड़की की शादी में इतना अधिक दहेज देना पड़ता हैं,कि एक सामान्य जीवन गुजारनें वालें व्यक्ति के लिये यह असंभव होता हैं.फलस्वरूप व्यक्ति इस दहेज रूपी धन को भ्रष्टाचार द्धारा ही एकत्रित करता हैं.
# 8.बुद्धिजीवियों का पलायन
हमारें देश का बुद्धिजीवी वर्ग स्वतंत्रता के पश्चात राजनिती,समाज आदि में भाग लेनें से अपनें आपकों धीरें – धीरें दूर करता रहा फलस्वरूप राजनिती समाज में अपराधी और भ्रष्ट प्रवृत्ति के लोग आ गये जिनका काम ही भ्रष्ट तरीके अपनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना रह गया हैं.
# 9.भ्रष्टाचार रोधी संगठन का अभाव
भारत में भ्रष्टाचार से निपट़नें के लिये कहनें को अनेक संगठन और संस्थाएँ कार्यरत हैं,जैसें केन्द्रीय सतर्कता आयोग,सी.बी.आई.लोकपाल,लोकायुक्त आदि परंतु ये सभी संगठन ” बिना दाँत के शेर” की तरह से साबित हो रहें हैं,जिस प्रकार बिना दाँत का शेर अपना शिकार करनें में अक्षम होता हैं,उसी प्रकार ये संस्थाएँ स्वंय संज्ञान लेकर भ्रष्टाचार के विरूद्ध प्रभावी कार्यवाही करनें में अब तक असफल साबित हुई हैं.
लोकपाल संस्था की बात करें तो सन् 1968 से ही इसे केन्द्र में स्थापित करनें का बार – बार प्रयास किया गया इसे स्थापित करवानें हेतू सन् 2011 में
अन्ना हजारे
दिल्ली में बड़ा जनआंदोलन कर चुके हैं,परंतु अभी तक इस संस्था को स्थापित नही किया गया हैं.
राज्यों में जहाँ लोकायुक्त संस्थाएँ गठित हैं वहाँ भी यह संस्था इतनी कमज़ोर हैं कि भ्रष्टाचारी़यों पर अभियोजन की स्वीकृति के लिये राज्य सरकार पर इसे निर्भर रहना पड़ता हैं.
भ्रष्टाचार रोधी सांवैधानिक संस्था का अभाव होनें से ही भारत में यह बहुत व्यापक हो गया हैं.
# 10.अशिक्षा और गरीबी
भ्रष्टाचार और अशिक्षा में बहुत निकट संबध हैं.अशिक्षित व्यक्ति अपनें अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति उस स्तर तक जागरूक नही रहता हैं जितना एक शिक्षित व्यक्ति फलस्वरूप उसे शासन प्रशासन में चलनें वालें कार्यकलापों से कोई मतलब नही रहता.यह स्थिति शासन प्रशासन में बैठें लोगों को अपनी मनमानी करनें हेतू प्रेरित करती हैं.
इसी प्रकार गरीबी भी भ्रष्टाचार का एक प्रमुख कारण हैं,संस्कृत में एक उक्ति हैं बुभुक्षित: किं न करोति अर्थात भूखा व्यक्ति क्या नही करता.
# 11.राष्ट्रीयता की भावना का घोर अभाव
“स्वतंत्रता के पूर्व भारत में देश सेवा की भावना एक मिशन के रूप में थी,किंतु यह आज के दोंर में कमीशन के रूप में हो गई हैं”
देश सेवा और देश प्रेम का मतलब अब बस दुश्मन राष्ट्र को भलाबुरा कहनें और खेलों में पराजित करनें पर पटाखे फोड़नें तक ही सीमित हो गया हैं.इसके अलावा न तो हम देश की सम्पत्ति को अपनी मानतें हैं और ना ही इस सम्पत्ति की रक्षा का दायित्व निभातें हैं,बल्कि लोगों की यही कोशिश रहती हैं,कि सरकारी सम्पत्ति में से कितना अपनें लिये प्राप्त कर लिया जायें.
एक उदाहरण इस संबध में देना चाहूँगा,अभी हाल ही में एक समाचार ने आमजनता का ध्यान अपनी ओंर खींचा था ,इस समाचार के अनुसार भारत में चलनें वाली रेलगाड़ी गतिमान एक्सप्रेस के बिजनेस वर्ग के कोच से यात्री Headphone निकालकर अपनें साथ ले गये.जब देश के संपन्न वर्ग का देश की संपत्तियों के प्रति यह सोच हैं,तो दूसरें वर्गों के बारें में आसानी से अंदाजा लगा सकतें हैं.
भ्रष्टाचार का प्रभाव
#1.व्यापक जन असंतोष का जन्म
देश में नित नये भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारीयों के खुलें आम घूमनें की वज़ह से जनता में व्यापक रूप से जन असंतोष का जन्म हो रहा हैं,और संविधान, न्यायपालिका,राष्ट्रीय आदर्शों का लोग खुलकर मजाक बनाकर सोशल मीड़िया में खूब शेयर कर रहें हैं.
युवा वर्ग में असंतोष बहुत गहरा हैं और वह जनआंदोलन के नाम पर हिंसा करनें से भी नहीं ड़र रहा हैं.इस हिंसा में देश की खरबों रूपये की संपत्ति और सामाजिक तानें बानें का बहुत नुकसान हो रहा हैं.कुछ युवाओं में इस असंतोष की परिणीति नक्सलवादी,आतंकवादी घटनाओं में शामिल होकर हो रही हैं.
# 2.समानांतर अर्थव्यवस्था का जन्म
भ्रष्टाचार की वज़ह से राजनितिज्ञों,व्यापारी,और प्रशासनिक अधिकारीयों के पास अरबों रूपयों की संपत्ति जमा हो जाती हैं,जिसे वे विदेशी बैंकों में जमाकर पुन: भारत में फर्जी कंपनियों के माध्यम से निवेश करतें हैं.इस तरह से एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हो जाती हैं जो देश का बहुत बड़ा नुकसान कर रही हैं.
सीमा पर तैनात अधिकारीयों को पैसा देकर नकली नोटों की खेप भारत लाई जाती हैं,जो हमारी अर्थव्यवस्था का गला घोंट़ रही हैं.
● 16 संस्कारों का परिचय
# 3.प्रगति में बाधा
भ्रष्टाचार देश की प्रगति को कई वर्ष पीछे ले जाता हैं,जब गुणवत्ताहीन सड़क,पुल पुलिया इमारतें बनेगी तो इनका जीवनकाल कम ही होगा फलस्वरूप शासन का ध्यान इन्हीं मुद्दों पर केन्द्रित रहेगा और विज्ञान,तकनीक,अतरिक्ष विज्ञान और शोध जैसें मुद्दे कही पीछे छूट जायेंगें.
विशेषज्ञों को भारत के विकासशील रहनें का यही कारण नज़र आ रहा हैं,जबकि भारत के साथ आजाद होनें वाला चीन भ्रष्टाचार के प्रति कठोर निति के कारण भारत से विज्ञान,शोध,और तकनीक ,खेल आदि के मामलें में कही अधिक आगें निकल चुका हैं.
# 4.प्रतिभा और योग्यता की उपेक्षा
भ्रष्टाचार की वज़ह से अयोग्य व्यक्ति शासन और प्रशासन पर काबिज हो जातें हैं फलस्वरूप योग्य व्यक्ति और प्रतिभाओं की उपेक्षा होती हैं,इस उपेक्षा की कीमत देश को चुकानी पड़ती हैं,उदाहरण के लिये यदि कोई अयोग्य व्यक्ति भ्रष्ट तरीके से शिक्षक बनता हैं,तो वह आनें वाली पीढी़ को बेहतर शिक्षा नही दे पायेगा.
इस तरह राष्ट्र की कई पीढ़ी बेहतर शिक्षा से वंचित रह जायेगी,बेहतर शिक्षा के अभाव में बेहतर व्यक्तित्व का निर्माण नही हो पायेगा और बेहतर राष्ट्र निर्माण का सपना भी अधूरा रह जायेगा.
#5.राष्ट्रीय संपत्ति का हास
भ्रष्टाचार के कारण राष्ट्रीय संपत्ति का बड़ा भाग भ्रष्टाचारीयों की तिजोरीयों में चला जाता हैं.एक अनुमान के अनुसार स्वतंत्रता के पश्चात से अब तक देश का लगभग 2.50 लाख करोड़ रूपया भ्रष्टाचार की भेंट़ चढ़ चुका हैं.
भ्रष्टाचार के संदर्भ में पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी का कथन बहुत प्रसिद्ध हैं,जिसमें उन्होंनें कहा था कि ” केन्द्र से भेजा गया 1 रूपया गाँवों तक पँहुचतें – पँहुचतें मात्र 15 पैसें ही रह जाता हैं.
## भ्रष्टाचार को दूर करनें के उपाय
# 1.समाज और परिवार की भूमिका
भ्रष्टाचार को समाप्त करनें का रास्ता समाज और परिवार से ही निकलता हैं.यदि परिवार बच्चों को ईमानदारी सच्चरित्रता और राष्ट्र के प्रति भक्ति की शिक्षा देगा साथ ही स्वंय परिवार के सदस्य इन उसूलों को स्वंय पर लागू करेंगें तो दुनिया की कोंई ताकत भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित नही कर पायेगी.
भ्रष्टाचार को समाप्त करनें का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण अंग समाज हैं,जब समाज भ्रष्टाचार से संपत्ति बनानें वालों को अलग थलग कर उन्हें सबसे घृणित समझेगा तो भ्रष्टाचार समाप्त होनें में ज्यादा समय नहीं लगेगा.
भारत में कानून से ज्यादा शक्तिशाली बदलाव का माध्यम समाज और परिवार हैं.जब कोई सामाजिक बदलाव लाना हो तो समाज और परिवार को साथ लेकर चलें बिना बदलाव नही लाया जा सकता.
भारतीय समाज के बदलाव में परिवार और समाज की भूमिका को हम दो संदर्भों में समझ सकतें हैं.
स्वतंत्रता संग्राम के दोरान महात्मा गाँधी नें ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध अपनें आंदोंलन में समाजों और परिवारों के बीच पहुँचकर उनका खुला समर्थन प्राप्त किया और स्वतंत्रता आंदोंलन को सफल बनाया.
दूसरा उदाहरण स्वच्छता अभियान का हैं,स्वच्छता अभियान में जब खुलें में शौच जानें को परिवार की महिलाओं की इज्जत के साथ जोड़ा गया तो देश में तेजी से शोचालय क्रांति आई और कई राज्य समय से पहलें खुले में शौच मुक्त हो चुकें हैं.
अब कोई बुराई समाज की सहायता से कैंसें आगें बढ़ती रहती हैं इसका भी उदाहरण देख लेतें हैं.
दहेज लेना और देना दोंनों कानूनन जुर्म हैं किंतु यह बुराई कई वर्षों से भारतीय समाज में व्याप्त हैं,क्योंकि दहेज लेना और देना समाज द्धारा स्वीकार्य हैं और यह बेटी के नये जीवन की शुरूआत में सहयोग के रूप में माना जाता हैं.
अत: कहा जा सकता हैं कि बिना परिवार और समाज के सहयोग से ही भ्रष्टाचार को समाप्त किया जा सकता हैं.
# 2.पारदर्शी व्यवस्था
शासन प्रशासन से भ्रष्टाचार को समाप्त करनें का सबसे महत्वपूर्ण साधन पारदर्शी प्रणाली हैं.
शासन के समस्त कार्यों को जब जनता की नज़रों के समक्ष पारदर्शी प्रणाली के साथ किया जायेगा तो भ्रष्टाचार होनें की संभावना को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता हैं जैंसें
१.परीक्षा प्रणाली में छात्रों को उत्तरपुस्तिका की प्रतिलिपी उपलब्ध कराना.
२.प्रतियोगी परीक्षाओं में चयनित अभ्यर्थीयों के अंकों का सार्वजनिकरण करना.
३.सार्वजनिक निर्माण कार्यों के कार्यों का स्वतंत्र जाँच ऐजेन्सीयों से मूल्याकंन कराना और इन ऐजेन्सीयों पर कड़ी निगरानी व्यवस्था.
# 3.कठोर दंड़ व्यवस्था
भ्रष्टाचार को समाप्त करनें का एक महत्वपूर्ण सूत्र कठोर दंड़ प्रणाली हैं.भ्रष्टाचारीयों को ऐसा दंड़ मिलना चाहियें कि वह अन्य भ्रष्टाचारीयों के लिये नजीर बन सकें.
भ्रष्टाचार में सलिंप्त व्यक्ति की समस्त चल अचल संपत्ति जब्त कर उसका उपयोग जन हितार्थ कार्यों में किया जावें.
#4. स्वतंत्र निगरानी समितियाँ
भ्रष्टाचार से निपट़नें और इसे समाप्त करनें हेतू ऐसी निगरानी समितियाँ नियुक्त की जायें जिसके पास न केवल व्यापक अधिकार हो बल्कि इसमें समाज के प्रत्येक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व हो .
यह संस्था भ्रष्टाचार से संबधित मामलों को सरकार और समाज के समक्ष रख सकें.साथ ही भ्रष्टाचार होनें के संभावित छिद्रों की पड़ताल कर उन छिद्रों तुरंत बंद करायें.
#5. लोकपाल और लोकायुक्त
भारत में सन् 1968 से ही लोकपाल की नियुक्ति के प्रयास चल रहें हैं परंतु यह संस्था अभी तक आकार नहीं ले सकी हैं.
अत: केन्द्र में ऐसा प्रभावी लोकपाल स्थापित किया जायें जिसके दायरें में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति सम्मिलित हो.
इस संस्था को शक्तिशाली उत्तरदायी बनाया जायें ताकि भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगें.
राज्यों में स्थापित लोकायुक्त को भी शक्तिशाली और जवाबदेय बनाया जायें जो फैसला लेंनें और क्रियान्वयन करवानें में सक्षम हो.तथा जिसकी नियुक्ति अराजनितिक हो.
#6. वेतन विसंगति दूर होनी चाहियें
भारत में कर्मचारीयों को दिये जानें वाले वेतन की संरचना दुनिया के दूसरें साफ सुधरें राष्ट्रों जैसें नार्वें,स्वीट्जरलैंड़ की तुलना में बहुत ही निम्न स्तर की हैं.
एक आदर्श प्रशासनिक व्यवस्था में उच्च और निम्न कर्मचारी के वेतन का अँतर 20% – 30% के बीच होना चाहियें जबकि भारत में यह अंतर 400% से 500% तक हैं.
वेतन संरचना सुधारनें से कर्मचारी भ्रष्टाचार की ओर पृवृत्त नही होगा.
#7. आर्थिक विषमता में कमी
भ्रष्टाचार में कमी करनें के लिये देश में फैली आर्थिक विषमता में कमी लाना अत्यंत आवश्यक हैं.
भारत में एक ओर दुनिया के सबसे अमीर 1% लोग जिनके पास देश की 60% संपत्ति हैं निवास करतें हैं वही दूसरी और दुनिया के सबसे गरीब 30% लोग भी यहीं निवास करती हैं.
जब तक इन गरीबों को गरीबी रेखा से ऊपर नहीं किया जाता तब तक भ्रष्टाचार का खात्मा मुश्किल होगा.
#8. आदर्श निर्वाचन प्रणाली
भारत में लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन में प्रत्याशीयों द्धारा अरबों खरबों रूपया पानी की तरह बहा दिया जाता हैं,जिसे जीतनें के बाद प्रत्याशी विकास कार्यों के लिये मिले धन की बंदरबाट करके हासिल करतें हैं.
भ्रष्टाचार को अल्पतम करनें हेतू आदर्श निर्वाचन व्यवस्था की अत्यंत आवश्यकता हैं जिसमें
• प्रत्याशी के चुनाव प्रचार की व्यवस्था निर्वाचन आयोग करें.
• चुनाव में खड़ें प्रत्याशी को प्रचार हेतू निर्धारित मंच उपलब्ध कराया जायें.जहाँ वह अपनी बात रख सकें.
• प्रत्याशी को चाय पान जितनी ही राशि खर्च करनें की अनुमति मिलें इससे ज्यादा खर्च करनें पर निर्वाचन आयोग द्धारा कड़ा नियत्रंण हो.
#9. राष्ट्र संघ की घोषणा अनुरूप व्यवस्था
भ्रष्टाचार पर राष्ट्र संघ की घोषणानुसार देश की निति और कार्यान्वयन निर्धारित होना चाहियें.
भ्रष्टाचार के प्रकार
भ्रष्टाचार अपनें आप में बहुत व्यापक शब्द हैं,इसके कई प्रकार हैं जैसें
#1.आर्थिक भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार का यह सबसे महत्वपूर्ण और सर्वव्यापक रूप हैं जिसमें शामिल हैं
#१.नियमानुसार नि:शुल्क होनें वालें कामों के बदलें में आमजनता से पैसा लेना या देना.
#२.जनता के लाभ के लिये बननें वालें सड़क,रेलवे लाइनों,पुलों,भवनों,और अन्य आधारभूत संरचनाओं के लियें स्वीकृत पैसों में से कमीशन लेना.
# ३.टेंड़र मंजूर करवानें के बदलें रिश्वत लेना.
# ४.पैसा लेकर परीक्षा पास करवाना या कापी में नम्बर बढ़ाना.
#५.दुकानदार द्धारा ग्राहकों को कम माल तोलकर अधिक पैसा लेना.
# ६.पैसा लेकर या देकर स्थानांतरण,पदोन्नति,पदस्थापना आदि करना या करवाना.
# ७.किसानों की अच्छी गुणवत्ता की फसल को घट़िया बताकर उसे रिजेक्ट करना और फिर पास करनें के बदलें पैसा लेना.
# ८.अधिकारीयों द्धारा सरकारी कार्यालयों में निरीक्षण के नाम पर जानबूझकर खामिया निकालना और बाद में पैसा लेकर उसे सही करना.
#९.फर्जी तरीके से यात्रा भत्ता,आवासीय भत्ता प्राप्त करना.
#१०.सरकारी राशन को खुलें बाजारों में बेचना.
# ११.बुजुर्गों,विधवाओं,विकलांगों को मिलनें वाली पेंशन में हेरफेर कर अपने खाते में अंतरित करवा लेना.
#१२.अवैध तरीके से शराब बनाकर बेचना.
# १३.नकली पैसा बाजार में चलाना.
#१४.सरकारी आवास को किराये पर देना.
#१५.यातायात नियमों के पालन न करनें वालों को पैसा लेकर छोड़ना.
# १६.पैसा लेकर या देकर वोट खरीदना बेचना.
# १७.रेल,बस में बिना टिकिट यात्रा करना.
# १८.शासकीय जमीन,आवास और संपत्तियों पर अवैध रूप से कब्जा करना.
#१९.पैसा लेकर समाचारों में खबरें प्रकाशित करना या करवाना.
#२०.कर चोरी करना या करवाना.
#2.सामाजिक भ्रष्टाचार
# १.जातपाँत के नाम पर भेदभाव करना.
# २.सांम्प्रदायिकता को प्रोत्साहित करना.
#३.बच्चों से भीख मंगवाना .
# ५.14 साल से कम उम्र के बच्चों से मज़दूरी करवाना.
# ६.बुजुर्ग माता पिता की सेवा नहीं करना, उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ना.
#७.पत्नि,बच्चों,बुजुर्गों से मारपीट करना.
# ८.बुराई में सलिंप्त रहना.
# ९.दूसरों के प्रति ईर्ष्या रखना.
# १०.शराब पीकर गाली गलोच करना.
#११.धोंस धमकी देना.
#१२.सामान में मिलावट करना.
#१३.झूठ बोलना.
#१४.दहेज लेना और देना.
#१५.बलात्कार,हत्या,छेड़छाड़ और परेशान करना.
#१६.झूठे आरोप लगाकर मानहानि करना.
#१७.सरकारी नियमों,कानूनों और सामाजिक मानदंड़ों का जानबूझकर उल्लघंन करना.
#१८.बढ़ा चढ़ाकर चीजों का विज्ञापन करना .
#3.धार्मिक भ्रष्टाचार
#१.धार्मिकता के नाम पर आड़म्बरपूर्ण व्यहवार करना.
#२. धर्म के नाम पर हिंसा को प्रोत्साहन देंना.
#३. दूसरें धर्मों के रिती रिवाजों धार्मिक क्रियाकलापों ,विश्वासों के प्रति घृणापूर्ण व्यहवार करना.
#४.बहुसंख्यक धार्मिक समूह द्धारा अल्पसंख्यकों को देश छोड़नें को मज़बूर करना.
#५.धर्म गुरूओं द्धारा धार्मिक पुस्तकों की गलत व्याख्या कर जनता को भ्रमित करना.
#६.धर्म का भय दिखाकर लोगों से पैसें ऐंठना.
#७.अंधविश्वासों को प्रोत्साहित करना.
# 4.खेलों में भ्रष्टाचार
#१. पैसा लेकर मेंच हारना या हरवाना.
#२. खेलों में उत्कृष्ठ प्रदर्शन के नाम पर प्रतिबंधित शक्तिवर्धक दवाईयों का सेवन करना.
#३.खेल निर्णायक द्धारा जानबूझकर किसी विशेष टीम का पक्ष लेना.
#४.अनैतिक तरीके अपनाकर मैच जीतना .
# ५.टीम चयन में पक्षपात करना.
#६.खेल नियमों के विरूद्ध दूसरी टीम के खिलाड़ीयों से व्यहवार करना.
#5.राजनितिक भ्रष्टाचार
#१. विरोधी दल को पैसा देकर कम़जोर प्रत्याशी खड़ा करवाना.
#२.फर्जी वोटर से मतदान करवाना या करना
#३.पैसा लेकर संसद या विधानसभा में प्रश्न पूछना.
#४.मतदान केन्द्र में घुसकर जबरन मतदान करवाना या करना या मतदान बूथ लूटना.
#५.विरोधी दल को कम़जोर करनें के लिये अनैतिक तरीके अपनाना.