शिक्षा

राष्ट्रीय युवा अभिमान सभा 

शिक्षा के क्षेत्र में निम्न प्रकार के बदलाव की किये जाय, जिससे समाज को और सुदृण और सुसांस्कृतिक बनाने के लिए शिक्षा में आमूल चूल परिवर्तन करने की युवा अभिमान सभा सख्त मांग करता है, किसी भी राष्ट्र के लिए शिक्षा का महत्व अत्यधिक होता है, शिक्षित समाज के लिए, शिक्षा व्यवस्था का मजबूत होना आवश्यक है। परंतु भारतीय व्यवस्था को देखते हुए शिक्षा व्यवस्था बहुत ही कमजोर और लचीली है। जहां राजनैतिक लोग अपने लाभ के लिए तरह तरह के पाठ्यक्रम को पेश करते हैं। वहीं कुछ अधिकारी भी नौनिहालों के  भविष्य  के साथ  खिलवाड़ करने से नहीं चूकते हैं। ऐसी व्यवस्थाओं को देखते हुए युवा अभिमान सभा इसमें परिवर्तन की मांग करती है, ताकि जो शिक्षा एक अमीर घराने के नौनिहाल को मिले, वही शिक्षा एक मजदूर के बालक को भी मिलनी चाहिए। भारत में कुछ इस प्रकार की शिक्षा का अभाव है। परंतु युवा अभिमान सभा लगातार इस दिशा में अपने कदम आगे बढ़ा रही है, और केंद्र एवं राज्य सरकार से विभिन्न प्रकार के परिवर्तन की मांग करती है। यह परिवर्तन मजबूत सरकार की मंशा को प्रदर्शित करते हैं। जिससे गरीबी और अमीरी के बीच की खाई को समाप्त किया जा सके, और भारत के समस्त  नौनिहालों को समान शिक्षा प्राप्त हो सके। 

01- 

शिक्षा में समानता का व्यवहार होना चाहिए। किसी को भी स्पेसियल वीवीआईपी जैसी व्यवस्था का मिलना असमानता कही जायेगी, गरीब और अमीर के लिए  शिक्षा में समानता होनी चाहिए, जहां एक गरीब रिक्सा चालक का बच्चा शिक्षा ग्रहण करने जाता हो वहाँ पर किसी अमीर, अधिकारी या बड़े व्यापारी के बच्चों को भी समान रूप से शिक्षा ग्रहण करने में आपत्ति न हो, देश और प्रदेश में शिक्षा का ऐसा माहौल बनना चाहिए। और निजी शिक्षालयों पर इसके पालन  करने पर कठोर दंडात्मक कार्यवाही होनी चाहिए।

02- 

शैक्षिक सत्र एक समान होना चाहिए। देखा जाता है कि लगभग अलग अलग राज्य में मौसम  व्यवस्थाओं को लेकर अलग अलग महीनों में सत्र की शुरुवात होती है जैसे उत्तर प्रदेश में पहले जुलाई में शैक्षिक सत्र की शुरुवात  होती थी परन्तु वहीँ कुछ बोर्ड्स अप्रैल से सत्र की शुरुवात करते थे, इन्ही व्यवस्थाओं के चलते यूपी सरकार ने भी अप्रैल से ही सत्र के शुरुवात करने की घोषणा की, लेकिन कई अव्यवस्थाओं के चलते सत्र को सफलता पूर्वक संचालन का रूप नहीं मिल पा रहा है, कुछ छात्रों को अप्रैल में ही पढ़ाई शुरू करनी पड़ती है तो वहीँ कुछ छात्रों को जुलाई में ही प्रवेश मिल पाता है, इसलिए देश के समस्त बोर्ड्स के शैक्षिक सत्र की शुरुवात एक साथ ही होनी चाहिए। 

03- 

शैक्षिक सामग्री एक समान होनी चाहिए। एक उपयोगी शिक्षा को समाज में और प्रत्येक राज्य में शिक्षण सामग्री में समानता, शिक्षित को हर राज्य में सम्मान मिल सके,  कठिनाई का सामना न करना पड़े, इसके लिए शिक्षण सामग्री का समान होना अति आवश्यक है, क्योंकि भाषा अलग हो सकती है लेकिन ज्ञान में समानता होनी चाहिए, शैक्षिक सामग्री एक समान होने से सम्पूर्ण भारतवासी छात्रों को पुरे भारत की जानकारी हासिल होगी और उन्हें किसी भी राज्य के भौगोलिक, राजनैतिक, परिवेश, सांस्कृतिक और आर्थिक जानकारी को प्राप्त कर परिपक्व हो सका.

04- 

शिक्षा सस्ती, सर्व सुलभ, एवम उच्च और निम्न स्तर के भेदभाव रहित होनी चाहिए।क्योंकि शिक्षा में बदलाव होना देश के लिए आने वाले दिनों के लिए खतरा साबित होगा क्योंकि जिस बच्चे को अच्छी शिक्षा नहीं मिल पाएगी जबकि वह अच्छी शिक्षा पाने का हकदार है और उसमें अच्छी शिक्षा पाने का पूरा टैलेंट भी है लेकिन भेदभाव के कारण और महंगी शिक्षा होने के कारण उसका अच्छी शिक्षा से वंचित होना उसके टैलेंट को दूसरी दिशा भी दे सकता है जो कि देश और समाज के लिए खतरा साबित हो सकता है अच्छी शिक्षा से समाज क्षेत्र जिला प्रदेश और देश को सुंदरता मिलती है जहां शिक्षा के अभाव में देश को विभिन्न विसंगतियों से जूझना पड़ता है वही अच्छी शिक्षा के कारण देश को इन विसंगतियों से छुटकारा मिलेगा

05- 

शिक्षा को जीवन के लिए सांस्कृतिक एवम व्यवहारिक होना चाहिए, ताकि जीवन मे उसकी उपयोगिता साबित हो, और सफल सामाजिक एवम आर्थिक जीवन सम्पन्न हो सके। भारत देश में शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए जिससे आने वाले जीवन की कठिनाइयों का सामना किया जा सके शिक्षा सांस्कृतिक एवं व्यवहारिक होनी चाहिए शिक्षा कौशल पूर्ण होनी चाहिए शिक्षा का आधार आर्थिक होना चाहिए क्योंकि आर्थिक युग में कौशल पूर्ण आर्थिक परिस्थितियों से  निपटने  की कलात्मक शिक्षा का होना अति आवश्यक है व्यवहारिक शिक्षा से जीवन में होने वाले उतार-चढ़ाव व उनसे निपटने की क्षमता का विकास होता है जबकि सांस्कृतिक शिक्षा से समाज को अच्छी दिशा देने की क्षमता का विकास होता है

06- 

शिक्षा को जीवन उपयोगी बनाने के लिए कौशल पूर्ण होने पर जोर दिया जाय। कौशल पूर्ण शिक्षा का तात्पर्य है कि छात्र की रूचि के अनुसार उसकी शिक्षा का निर्धारण किया जाना चाहिए  और उसी के आधार पर उस के भविष्य को ध्यान में रखते हुए रुचिता के आधार पर शिक्षा दी जानी चाहिए जहां पर शिक्षा छात्र की रुचि के विपरीत थोपी  जाती है वहां पर छात्र बिना मन से शिक्षा ग्रहण करता है और मूलता विषय से विरत रहता है जबकि उसकी रुचि का जब विषय प्राप्त होता है तो वह मन लगाकर शिक्षा ग्रहण करता है और अधिकतर  सफलता प्राप्त करता है

07- 

शिक्षा में रिक्सा चालक एवम जिलाधिकारी के बेटे को समान पाठ्यक्रम और सुविधाओं के साथ ही समान व्यवहार मिले। जहां पर गरीबी और अमीरी के आधार पर शिक्षा का बंटवारा किया जाता है वहां देश और प्रदेश के सामान्य जीवन स्तर में बहुत अंतराल देखने को मिलता है जबकि शिक्षा उस अंतराल को मिटाने के लिए ही प्रदान की जाती है शिक्षा के क्षेत्र में गरीबी और अमीरी का भेदभाव समाप्त होना चाहिए शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जहां एक जिलाधिकारी, उच्च पदस्थ राजनैतिक व्यक्तित्व या बड़े बड़े व्यापारियों के बच्चे जहां शिक्षा ग्रहण कर रहे हो, वहीं एक रिक्शा चालक या एक मजदूर का बच्चा भी शिक्षा ग्रहण कर सके.

08- 

शिक्षा के लिये योग्य और वर्तमान परिस्थितियों को समझने वाले और उसके अनुसार ही शिक्षा प्रदान करें, ऐसे शिक्षकों की भर्ती की जाय।आजकल देखा गया है की शिक्षक शिक्षा देने का काम कम करते हैं जबकि शिक्षा प्रदान करने वाले समय में ही राजनीतिक विषयों पर या अन्य सामयिक विषयों पर अपना समय व्यतीत करते रहते हैं और अगर कुछ समय छात्रों के बीच में जाकर शिक्षा देने का काम भी किया तो वही  रटी रटाई शिक्षा देने का काम करते हैं जबकि आज की शिक्षा के लिए वर्तमान परिस्थितियों को देखकर और उनसे निपटने की क्षमता भरी शिक्षा होनी चाहिए इसके लिए जहां ऐसे शिक्षकों की कमी है वहां पर योग्य और वर्तमान परिस्थितियों को  समझने वाले और उसके अनुसार ही शिक्षा प्रदान करें ऐसे शिक्षकों की भर्ती की जाए.

09- 

शिक्षा के पाठ्यक्रम को राजनैतिक स्तर पर प्रभावित न किया जा सके, ऐसे नियमो की प्रतिबद्धता बने, भारतीय शिक्षा में कुछ कठोर नियमों की अत्यंत आवश्यकता है, आज भारत में राजनैतिक प्रभाव का बोलबाला है, और सत्ता में आने वाला दल अपने अनुसार पाठ्यक्रम तय करता है, जबकि भारत में राजनीतिक दलों के अनुसार पाठ्यक्रम का तय किया जाना नहीं होना चाहिए, बल्कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिससे प्रदेश और देश का विकास हो सके, एक सुदृढ़ समाज की स्थापना की जा सके, एक शिक्षित समाज से मजबूत देश बने, ऐसा पाठ्यक्रम होना चाहिए, इसलिए पाठ्यक्रम में रोजाना छेड़छाड़ ना हो, इसके लिए कठोर नियम बनने चाहिए। 

10- 

शिक्षा का स्तर उच्च हो, इसके लिए आयोग का निर्माण हो, जिसकी निगरानी में शैक्षिक कार्यक्रम सम्पन्न हो। भारत में राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते विभिन्न प्रकार के आयोगों का गठन तो हो गया है, परंतु देश का मूल विषय शिक्षा है, और शिक्षा का आज तक कोई निगरानी आयोग नहीं बन सका, जिससे शिक्षा पूर्ण रूप से राजनैतिक दलों के हस्तक्षेप का विषय बना रहता है, जबकि मजबूत शिक्षा के लिए एक सशक्त आयोग का गठन होना चाहिए, जिसमें संपूर्ण प्रकार की शक्तियां निहित हो। आयोग में दंडित करने की शक्ति का पूर्ण रूप से समावेश होना चाहिए क्योंकि तुलसीदास जी भी कह गए हैं भय बिन होय न प्रीत।

11- 

सभी सरकारी कर्मचारियों के बच्चों की शिक्षा सरकारी व प्राइमरी विद्यालयों में होनी चाहिए, इसके लिए माननीय उच्च न्यायालय ने एक बार जिस आदेश को पारित किया था उसे लागू किया जाए। सरकार अपने सभी अधीनस्थ कर्मचारियों को, उनके बच्चों की शिक्षा के लिए विभिन्न प्रकार के देयकों की व्यवस्था करती है, जबकि सरकार के पास अपने खुद के सरकारी विद्यालय हैं, फिर ऐसी स्थिति में उनको किसी प्रकार का फंड देने की आवश्यकता क्यों पड़ती है, क्या यह एक प्रकार का सरकार के विरुद्ध, सरकारी कर्मचारियों का चलन नहीं है, सरकारी कर्मचारियों को ही, सरकार के द्वारा दी जा रही, सरकारी विद्यालयों में दी जा रही शिक्षा व्यवस्था पर विश्वास ना होना, सरकार के विपरीत एक आंदोलन स्वरूप प्रतीत होता है। जबकि सरकार शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की योजनाएं ला रही है, ताकि छात्रों का भविष्य और स्वास्थ्य सुरक्षित रह सके। बावजूद इसके भी सरकारी कर्मचारी अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में नहीं भेजते हैं। इसके लिए उत्तर प्रदेश में माननीय उच्च न्यायालय ने एक आदेश पारित कर कहा था कि, सभी सरकारी कर्मचारियों को अपने बच्चों की शिक्षा सरकारी विद्यालयों में ही दिलाना अनिवार्य होगा, परंतु रसूखदारों के चलते माननीय उच्च न्यायालय ने अपने आदेश को वापस ले लिया, या यूं कहें कि आदेश को शिथिल कर दिया गया। युवा अभिमान सभा इस दिशा में माननीय उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय और राज्य एवं केंद्र सरकार से यह मांग करती है कि, तत्काल  एक आदेश पारित किया जाए, जिसमें यह लिखा हो कि, सभी सरकारी कर्मचारी एवं सरकार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से लाभ प्राप्त करने वाले सभी परिवारों के बच्चे सरकारी विद्यालयों में ही शिक्षा ग्रहण करेंगे।

12- 

कक्षा 08 तक प्रदेश स्तरीय बोर्ड, और 10-12 तक केंद्रीय बोर्ड का गठन हो, जिसमे सभी प्रदेश की शिक्षा सामग्री से लेकर कार्य सम्पन्न करवाने की शक्तियां निहित हो। देश की आजादी से लेकर आज तक शिक्षा के क्षेत्र में जितना परिवर्तन होना चाहिए, उतना परिवर्तन नहीं हुआ है। बल्कि शिक्षा को लेकर सरकारों में नीरसता ही देखने को मिलती है। सरकारी व्यवस्था शिक्षा को मजबूत करने की ओर नजर नहीं आती है। आज की व्यवस्था को देखते हुए बहुत ही बड़ी व्यवस्था में परिवर्तन की आवश्यकता है। परिवर्तन इस प्रकार होना चाहिए कि. राज्य सरकारों द्वारा 1 बोर्ड का गठन किया जाए. जिसके अंतर्गत कक्षा 8 तक की शिक्षा व्यवस्था के संचालन का सम्पूर्ण अधिकार होना चाहिए, वहीं केंद्र सरकार द्वारा भी 1 बोर्ड का गठन होना चाहिए, जिसमें कक्षा 9 से लेकर कक्षा 12 तक की शिक्षा व्यवस्था का संचालन होना चाहिए, और इस केंद्रीय बोर्ड का नियंत्रण राज्य द्वारा गठित बोर्ड पर भी होना चाहिए, केंद्रीय बोर्ड में उन सभी शक्तियों का समावेश होना चाहिए, जिसमें शैक्षिक सत्र, शिक्षा सामग्री, अध्यापक भर्ती एवं शिक्षा संबंधी सभी कर्मचारियों पर कार्रवाई से लेकर उनकी नियुक्ति तक का अधिकार होना चाहिए। 

13- 

केंद्रीय बोर्ड विभिन्न भाषाओं में पाठ्यक्रम का संचालन करे, लेकिन सभी मे एक समान सामग्री का होना अनिवार्य हो। केंद्रीय बोर्ड द्वारा ऐसे पाठ्यक्रमों को तैयार किया जाना चाहिए, जिसका आज के जीवन में और आने वाले समय से छात्रों का भविष्य सुद्रण रूप से मजबूत हो सके। और वहीं केंद्रीय बोर्ड को विभिन्न राज्यों की अलग-अलग भाषाओं में समान पाठ्यक्रम को देना चाहिए, संपूर्ण देश में समान पाठ्यक्रम से समान प्रकार की शिक्षा का संचालन होगा और एक समान सोच के छात्रों को तैयार किया जा सकता है। परंतु विभिन्न प्रकार के भाषाई और क्षेत्रवाद एवं राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते राज्य स्तरीय बोर्ड में बदलाव आ जाता है, और एक राज्य का छात्र जब दूसरे राज्य में शिक्षा ग्रहण करने या नौकरी करने जाता है तो, उसे विभिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, परंतु जब समान पाठ्यक्रम केंद्रीय बोर्ड द्वारा उपलब्ध कराया जाएगा तो आने वाले समय में इस प्रकार की समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा। 

14- 

केंद्रीय बोर्ड द्वारा ही सभी विद्यालयों (सरकारी, अर्धसरकारी, निजी विद्यालय) में पाठ्यक्रम सामग्री, परिवेश (ड्रेस), शैक्षिक समय सारणी, आदि का निर्धारण किया जाय। एक सशक्त केंद्रीय बोर्ड द्वारा यह तय किया जाना चाहिए कि विद्यालयों में किस प्रकार की वेशभूषा होगी और विद्यालयों के खुलने और बंद होने का समय भी केंद्रीय बोर्ड द्वारा ही निर्धारित किया जाएगा। अब यह व्यवस्था चाहे सरकारी विद्यालयों में हो, अर्ध सरकारी विद्यालयों में हो या निजी विद्यालयों में हो। शिक्षा संबंधी समस्त नियम कानून बनाने का अधिकार केंद्रीय बोर्ड को ही होगा। निजी विद्यालयों द्वारा अपने मनमाने तरीके से  किसी अन्य प्रकार के नियम कानून लागू करने का कोई अधिकार ना होगा। वहीं शिक्षण सामग्री भी केंद्रीय बोर्ड द्वारा तय प्रकाशन की ही मांग होगी। इसके लिए विभिन्न प्रकार का बाजारीकरण रोकना होगा, और निजी विद्यालयों पर सख्ती करनी होगी ताकि नियमों में अनियमितता ना बरती जा सके। 

15- 

तय मानक एवम सुविधाओं पर कम से कम फीस पर शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। केंद्रीय बोर्ड द्वारा यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किस कक्षा की फीस क्या होगी और किन सुविधाओं पर उस निर्धारित फीस पर कितनी कितनी बढ़ोतरी की जा सकती है, ताकि निजी विद्यालयों द्वारा मनमाने तरीके से वसूली जा रही फीस पर रोक लग सके, और बेहतर शिक्षा मिल सके, केंद्रीय बोर्ड को यह भी ध्यान रखना होगा कि फीस का मानक इस प्रकार से तय किया जाए कि जिससे गरीबी और अमीरी का भेदभाव शिक्षा व्यवस्था में ना आ सके और हर बच्चे को बेहतर शिक्षा मिल सके। केंद्रीय बोर्ड को यह भी ध्यान रखना होगा कि जिन निजी विद्यालयों द्वारा इन नियमों का उल्लंघन करते पाया जाएगा, उस निजी विद्यालय संचालक और प्रधानाचार्य पर गंभीर धाराओं में मुकदमा पंजीकृत करने के साथ ही विद्यालय की संबद्धता को भी समाप्त किया जाएगा। 

16- 

अध्यापकों की नियुक्ति बोर्ड द्वारा तय मानकों पर अनुमोदन उपरांत ही हो, जिससे शैक्षिक गुणवत्ता के साथ आर्थिक युग की परिस्थितियों के अनुकूल शिक्षा प्रदान की जा सके। प्राय देखा जाता है कि राजनीतिक हस्तक्षेप के  चलते गुणवत्तापूर्ण शैक्षिक व्यवस्था का अभाव है, कहीं अध्यापकों की कमी है तो, कहीं अध्यापकों की अधिकता के बावजूद छात्रों का नदारत होना भी पाया जाता है, परंतु मौजूदा व्यवस्था के चलते शिक्षकों का स्थानांतरण इस प्रकार नहीं किया जाता है कि, जहां अधिक छात्र हैं, वहां अध्यापकों को स्थानांतरण करके प्रतिपूर्ति की जा सके। वही यह भी देखा जाता है कि, निजी विद्यालयों में अध्यापकों की भर्ती मनमाने तरीके से कर ली जाती है, जिसके लिए सारे नियम कायदे कानून और मानक ताक पर रख दिए जाते हैं, केंद्रीय बोर्ड को यह भी ध्यान रखना होगा कि, निजी विद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति बोर्ड द्वारा तय मानकों पर अनुमोदन उपरांत ही हो। केंद्रीय बोर्ड में सरकारी और अर्ध सरकारी विद्यालयों के लिए, बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते, शिक्षकों की भर्ती बोर्ड ही तय करेगा। और इन अध्यापकों का समय-समय पर स्थानांतरण भी किया जा सकेगा, ताकि शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता लाई जा सके। 

17- 

राज्य बोर्ड एवम केंद्रीय बोर्ड पर नियंत्रण के लिए आयोग में शक्तियां निहित हो, और आयोग का प्रमुख कोई राजनैतिक व्यक्ति न होकर किसी रिटायर्ड जज का होना अनिवार्य है। शिक्षा को सही दिशा देने के लिए उपर्युक्त धारा 10 में बताए गए आयोग में कुछ ऐसी शक्तियों का भी समावेश होना चाहिए, जिससे आयोग राज्य बोर्ड एवं केंद्रीय बोर्ड पर नियंत्रण कर सके, और अनियमितता बरतने पर उन्हें दंडित कर सके। वहीं यह भी ध्यान रखना होगा कि, आयोग का प्रमुख कोई राजनीतिक व्यक्ति ना हो, जिससे शिक्षा व्यवस्था में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ सके, बल्कि आयोग का प्रमुख एक ऐसा व्यक्ति हो, जो नियम, कायदे, कानून को अनिवार्य रूप में लागू करवा सकें, इसलिए आयोग का व्यक्ति राजनीतिक व्यक्ति ना होकर उच्चतम न्यायालय का रिटायर्ड जज होना चाहिए, जोकि शिक्षा की आवश्यकता को और उसकी गुणवत्ता को महसूस कर सकें, और उसका कड़ाई से पालन करवाने में सक्षम हो। 

18- 

शिक्षा निशुल्क होनी चाहिए, चाहे वह सरकारी विद्यालय, अर्ध सरकारी विद्यालय, या निजी विद्यालय की श्रेणी में आता हो, इसका सम्पूर्ण खर्च राज्य सरकार एवम केंद्र सरकार को उठाना अनिवार्य। आयोग और केंद्रीय बोर्ड को यह निर्धारित करना होगा कि संपूर्ण भारतवर्ष में शिक्षा निशुल्क होनी चाहिए, जिससे गरीबी और अमीरी का भेदभाव मिट सके और शिक्षा का संपूर्ण रूप से विकास किया जा सके, योग्यता को स्थान मिल सके, ताकि देश के विकास को एक नई दिशा मिल सके। केंद्र सरकार द्वारा शिक्षा का बजट ऐसा निर्धारित किया जाए, जिससे निजी विद्यालयों में भी निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था हो जाए। जिसके लिए राज्य सरकारों से भी सहयोग लिया जाए। ताकि शिक्षा के क्षेत्र में मजबूती लाई जा सके, और निजी विद्यालयों की मनमानी फीस की वसूली पर रोक लगाई जा सके, इसके लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों को शिक्षा निशुल्क करनी ही होगी, नहीं तो लगातार गरीबी और अमीरी के बीच बढ़ता अंतराल देश के लिए खतरनाक साबित हो सकता है, आपसी द्वंदता ही विध्वंसक परिणाम देते हैं, इसलिए ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न ना हो, इसके पहले ही केंद्र व राज्य सरकार को शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे, और शिक्षा को निशुल्क करना होगा। 

19- 

उच्च शिक्षा के लिए ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन, एवम अन्य सभी शैक्षिक डिग्री व डिप्लोमा को केंद्रीय आयोग की निगरानी में सम्पन्न कराया जाय, जिसमे अनियमितता मिलने पर दण्डित करने की सम्पूर्ण शक्तियां निहित हो। वर्तमान स्थितियों में संचालित हो रही उच्च शिक्षा के लिए केवल इतना परिवर्तन किया जाए कि  इन सब की निगरानी की व्यवस्था केंद्रीय आयोग के अधीन हो, जिससे विभिन्न प्रकार के रोजाना विवादों पर लगाम लगे, और अनियमितता पकड़े जाने पर महाविद्यालयों के खिलाफ कठोरतम कार्यवाही की जा सके, केंद्रीय आयोग द्वारा यह भी तय किया जाए कि उच्च शिक्षा के लिए ली जा रही विश्व विद्यालयों द्वारा फीस का निर्धारण सही है या गलत है, अगर गलत है तो, तय मानकों के आधार पर फीस का निर्धारण पुनः किया जाए और सभी प्रकार की अनियमितताओं पर रोक लगाई जाए। 

20- 

केंद्रीय आयोग पर प्रधानमंत्री या अन्य किसी राजनैतिक प्रतिनिधि का हस्तक्षेप नही होना चाहिए, केंद्रीय बोर्ड पर राष्ट्रपति का नियंत्रण होना अनिवार्य हो। केंद्रीय आयोग के प्रमुख का चयन भारत के  प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा तय किए गए नाम पर राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदन प्राप्त होने के पश्चात हो। आयोग का कार्यकाल अधिकतम 3 वर्ष का हो। आयोग को कार्य संपन्न करवाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा संपूर्ण व्यवस्था उपलब्ध करवाई जाएं और इसका संपूर्ण खर्चा भी केंद्र सरकार के द्वारा वहन किया जाए। 

WhatsApp
Instagram
THREADS
Scroll to Top